સોમવાર, 1 જુલાઈ, 2013

लघु प्रेम कथा ( लप्रेक ) -ravish kumar


लघु प्रेम कथा ( लप्रेक )

सुनो तुम फ़ेसबुक में सारी बातें क्यों लिख देते हो ? क्यों ? वहां कही गई आधी बातें मेरे लिए थीं और मुझसे कही भी नहीं गईं । जब भी तुम्हारे पास होती हूँ तुम ख़ाली होते हो । अरे नहीं । देखो न आज की ये शाम, ये मौसम और हाँ अख़बार में छपी ये तस्वीर । आइसक्रीम आर्डर करूँ ? कितना कुछ है बात करने को । मैं उन बातों की बात नहीं कर रही । तुम्हारे सारे अहसास मुझ तक पहुँचने से पहले बंट चुके होते हैं । तुम्हारी कल्पनाएँ कहीं और उतर चुकी होती हैं । जिनमें मैं भी होती हूँ और कई बार कोई और । तुम ऐसा क्यों सोचती हो । ख़ाली तो तुम भी हो । दरअसल हमदोनों हैं । नहीं तुम हो । शायद कुछ मैं भी । पहले हम चुप रह कर घंटों बातें किया करते थे और अब घंटों बातें कर चुप्पी सी लगती है । 
(२)
मैंने एक रेखाचित्र खींची है । तुम्हारे साथ इस शहर में चलते हुए । हाँ देख रही हूँ । हर रास्ता दूसरे से लिपटा हुआ लगता है । हाँ हर रास्ता उलझा हुआ भी । जब भी मैं इस शहर से निकलना चाहता हूँ कोई न कोई रास्ता लौटा लाता है । मैं तुम्हें हर लैंप पोस्ट पर खड़ा देखती हूँ । हर बस की पहली सीट पर तुम्हीं बैठे लगते हो । अब हम कम चलते हैं न ? मिलने के लिए चलते ही नहीं । बस पहुँचते हैं । हाँ जब से हमने घर बसाया है, हम शहर छोड़ आये हैं । रास्ते, लैंप पोस्ट, बस की पहली सीट, पापकार्न का कार्नर । कितना कुछ छूट गया हमारे मिलने में न ? तुम चुप क्यों हो ? रेखाचित्र देख रही हूँ । 
(३) 
बहुत दिनों से सोचा था तुम्हें एक ख़त लिखूँगी । तुम्हारे बिना लिखना ही अच्छा लगता है । अल्फ़ाज़ तुम तक पहुँचने के क़दमों के निशान लगते हैं । डर लगता है कोई पीछे पीछे न आ जाये । कितनी पास है मंज़िल पर हमने रास्ते को लंबा कर लिया है । हम मुल्कों में बंट गए हैं । तुम वहाँ मैं यहाँ । मैं बस यही लिखना चाहती हूँ कि कम से कम पढ़ना तो रोना मेरे लिए । मैं भी रोना चाहती हूँ । अपने सर्टिफ़िकेट पर खड़े अरमानों की इमारत की छत पर जाकर । ये ख़त तुम तक पहुँचने से पहले डाकिया पढ़ लेगा । ज़ालिम है वो । पर तुम तो नहीं हो न । तुम तो मेरे अल्फ़ाज़ों को समझ लोगे न । मैं किससे कहूं । तुम्हारी बातें भी ख़ुद से कहती हूं । थक गई हूं । आमीन !

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