सरदार पटेल का कुर्मीकरण
मंडल के बाद के दौर में सरदार बल्लभ भाई पटेल कुर्मियों के नेता भी हैं । उनकी जन्मशताब्दी पर पटना से लेकर उत्तर भारत के उन हिस्सों में जहाँ जहाँ कुर्मी आबादी है वहाँ वहाँ सरदार पटेल की याद में कुर्मी जाति के नेता विद्वान जमा होते हैं । पटेल की जन्मशताब्दी कुर्मी ही मनाते हैं अब । जैसे जाट समाज की किसी भी अधिकार रैली में आप भगत सिंह की तस्वीर देखेंगे । तो आने वाले दिनों में सरदार पटेल का कुर्मीकरण तेज़ी से बढ़ेगा । वे लौह पुरुष जैसे कृत्रिम फ़्रेम में अब और नहीं रह सकते ।
इस देश में जब बनिया समाज की रैली में गांधी का पोस्टर टंग जाता है तो सरदार पटेल क्या चीज़ हैं ।
मोदी को कुर्मी सरदार पटेल की ज़रूरत है ।इसीलिए अहमदाबाद में नरेंद्र दामोदरदास मोदी सरदार पटेल की आदमकद मूर्ति बनाने जा रहे हैं । ताकि वहां से पटेल की मूर्ति पटना और बरेली में दिखे । अपनी पार्टी के लौह पुरुष से आज़िज आ चुके मोदी गाँव गाँव से लोहा मंगा रहे हैं । इसलिए नहीं कि सरदार की कोई राष्ट्रवादी छवि काम आएगी । इसलिए कि पटेल कुर्मी हैं । गोवा में चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन चुने जाने के अगले दो दिनों में मोदी ने पहला काम यही काम किया । सरदार पटेल की आदमकद प्रतिमा बनाने का एलान किया । दो साल से मोदी इस योजना पर काम कर रहे थे । अचानक इसमें इतना व्यस्त हो गए कि आडवाणी को मनाने के लिए दिल्ली तक नहीं आए । अपने कार्यकर्ताओं से कहने लगे कि जाओ गाँव गाँव से गुजरात के हर घर से लोहा ले आओ । घर घर ये ईंट लाने की राजनीति से राम मंदिर नहीं बना सके तो क्या हुआ । कुछ नेताओं की मूर्तियाँ तो बन ही सकती है । लखनऊ में अम्बेडकर की आदमकद मूर्ति और पार्क और अहमदाबाद में कुछ नहीं । क्या मोदी को जातिवादी राजनीति का ज्ञान नहीं है ।
तो मित्रों नीतीश कुमार कौन हैं ? कुर्मी भी हैं । उन्होंने समाज के बड़े नेता सरदार पटेल की आदमकद मूर्ति बनाई ? मोदी कहेंगे मैं बनवा रहा हूँ । बिहार की रैलियों में इस मूर्ति का ज़िक्र खूब आयेगा । अमरीका के स्टैच्यू आफ़ लिबर्टी से भी ऊँची । जब बुधवार को पटना में शिवानंद तिवारी ने मोदी के इस क़दम पर हमला किया तो उसका एक मतलब यह भी होगा कि पहले से जवाब तैयार रखना । शिवानंद ने मोदी से सवाल किया कि आप कांग्रेस मुक्त भारत बनाने निकले हैं । पटेल भी तो कांग्रेस परंपरा के हैं । क्या संघ में कोई नेता नहीं जिसकी आदमकद प्रतिमा बन सके । यह सरल बयान नहीं है । मोदी को पटेल से प्यार होता तो आडवाणी को ही ख़ुश करने के लिए उनकी मूर्ति बना देते । लेकिन राजनीति में भक्ति नहीं मौक़ा बड़ा होता है ।
मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देकर ग़ैर कांग्रेस और कांग्रेस विरोधी राजनीति की ख़ाली होते तमाम छोटे छोटे प्लाट पर दावेदारी के लिए नारा दिया है । कांग्रेस विरोधी सपा बसपा आरजेडी अंत में कांग्रेस के ही काम आए । मोदी इसका लाभ उठाने की रणनीति पर चल रहे हैं । अपनी राष्ट्रीय पहचान को जातिवादी पहचान में घुलने दे रहे हैं । अचानक आप सुनेंगे कि मोदी बैकवर्ड हैं । बनिया हैं । बीजेपी मोदी के सहारे पिछड़े नेताओं को भी चुनौती देगी । सफल होगी कि नहीं मैं नहीं जानता । वोट बैंक से ऊपर उठ कर राजनीति करने का अपना दावा छोड़े वोटों के छोटे छोटे गुल्लक ढूँढने निकल रहे हैं ।
नब्बे के बाद कुर्मियों की हर रैली में सरदार पटेल का पोस्टर होता है । उपेन्द्र कुशवाहा जो कुर्मी-कोइरी युग्म बिरादरी के कोइरी प्रखंड के नेता हैं वे जब भी रैली करते हैं सरदार पटेल के पोस्टर से पटना को भर देते हैं । आजकल नीतीश से नाराज़ हैं । उनसे बाग़ी हो गए हैं । आने वाले कल में मोदी के काम आयेंगे । सरदार पटेल ने राजशाही को समाप्त कर रजवाड़ों को देश में मिलाकर एकता के प्रतीक बन गए । अब उनकी स्टैच्यू आफ़ यूनिटी की मूर्ति नीतीश के पाले से कुर्मियों को तोड़ने के काम आएगी । पर क्या कुर्मी इतनी आसानी से अपने सजीव नेता को छोड़ इतिहास के प्रतीक पर दिल लुटा देंगे ? या पटेल पोस्टर टाँगने के ही काम आते रहेंगे ? मोदी को लगता है कि जब वे बनिया- तेली समाज से आकर गुजरात में पटेलों के नेता बन सकते हैं तो बिहार में क्यों नहीं । देखते हैं । वैसे एक पाठक ने बताया है कि मोदी घांची समुदाय के हैं । बनिया नहीं है और गुजरात में जाति के आधार पर वोट नहीं होता ! कड़वा लेउआ पटेल सम्मेलन ! ख़ैर । गुजरात में नहीं होता होगा मगर बिहार में होता है ।
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